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रविवार, 26 सितंबर 2010

More than routine thinking

Its time to sleep (3.15 am), but there is no sleep in my eyes. Today itself got an idea to develop my own skill, which was lost somewhere in paradise. Honestly there is a feeling of reform myself in order to build such ground where I could stand. As a person what I should do other than my routine duties of teaching? I know there is such urgency to read and write more, but surely I am not up to my mark. Need to do something more for my own self. There are many questions, when I tries to analyse them, they starts pelting stone, sometimes I realize but most of the time, I do not have ability to recognize them. I really feel awkward when I find myself nowhere. Where and how I have to go, there is no honesty in my efforts. To say simply its sort of confusion or frustration, but frankly speaking I am ignoring my own inner voice. It may possible, sometimes I am so crazy that avoid to listen it. I will be honest when I will add more constructive things in my routine. Hope for the Best.

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

पंचायती चुनाव और भ्रष्टाचार

यू पी में पंचायत चुनाव हो रहे हैं. मैंने अनुभव किया है कि पंचायती चुनाव गाँव के आम लोगों कि रही- सही संवेदनशीलता को भी छीन रहा है. पैसे कि छोटी लालच के लिए गाँव के अपने वाशिंदे गाँव कि तरक्की को भूलकर देश के आम नेताओं कि तरह पंचायत के पैसे को लुटने में लगे हुए हैं. यही वजह है कि गावं के पंचायत का चुनाव अब अपने गाँव के विकास के लिए नहीं बल्कि पैसा बनने के लड़ा जा रहा है. जो भी हो ईमानदारी का कोई भी नामों- निशान नही रह गया है किसी भी चुनाव में. हम किसी और के गाँव कि बात नही करेंगे, बल्कि उस गाँव कि बात करेंगे जहाँ हम रहते हैं. ब्लाक प्रमुख और पंचायत सदस्य खुले आम किसी अमीर या अपराधी प्रवृति के लोंगो कि बाट जोहते हैं. क्योंकि पैसा वही लोग दे सकते है. खुलेआम बोली लगती है. मै इधर बीच एक अलग तरह के लोगों को समाज के बीच फलते- फूलते देख रहा हू. किसी ज़माने में पर्वांचल के माफिया के रूप में कुख्यात एक परिवार से ताल्लुक रखने वाले सभी लोग पंचायत से लेकर जिला परिषद् और मेयर के चुनावों में कूद पड़े है. अख़बारों में उनकी पेशी के समय विज्ञापन ऐसे आता है जैसे वे महात्मा गाँधी जैसे नेक दिल फ़रिश्ते है. कारण सिर्फ एक है, इन लोगों ने अपराध करकर इतना पैसा कमा लिया है कि उस पैसे के नाम पर वे अब समाज सेवा का बिगुल फूक रहे हैं. ये लोग पैसा देकर जरुरी मतों को खरीद सकते है और उसे दूसरे के पक्ष में भी कर सकते है. समाज के इस तबके से कैसे निपटा जाय , इस पर सबको सोचने की जरुरत है. मुझे समझ में नहीं आता क्यों लोग एकाएक भ्रष्ट होते जा रहे है. गाँव के विकास के लिए मिलने वाले पैसे का दुरुपयोग अपने ही आस पास के लोग कैसे करते हैं, इसका जीता- जगाता नमूना ये पंचायत के चुनाव है. मुझे दुःख होता है कि गाँव भी भ्रष्ट हो चुके है. ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार ने अपनी जड़े मजबूत कर ली है. यदि गाँव के चुनाव में संवेदना नही रह जाएगी तो देश के स्तर पर हम अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र है. प्रश्न अब भी अपनी जगह पर है कि कैसे इन चुनावों को अपराधी और पैसे वाले निकम्में लोगो से दूर रखा जाये.
सतीश कुमार सिंह

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

एक मई के सवाल

आज एक मई है .दुनिया के सभी मजदूरों के एक होने के स्वप्न का यह नारा क्रेमलिन के चौक पर भी नही सुनायी दिया. एकाएक ऐसा क्यों हो गया की मजदूरों की आवाज़ इस दुनियां में दम तोड़ती जा रही है. जबकि हकीक़त है की आज भी इस दुनियां में सबसे अधिक आबादी कामगारों की ही है. जनतंत्र के अपने मायनों के बीच अगर सबसे अधिक आबादी की आवाज़ गुम हो गयी है तो इसमे किसका दोष है. खुद कामगारों का या उनको इशारों पे नचाने वाले उन लोंगो का, जिनके लिए वे तिनके के बराबर भी हैसियत नही रखते. प्रश्न ये है की दुनियां की सबसे बड़ी आबादी आज भी ये क्यों नही समझ पाती है कि उनकी अपनी नासमझी कि वजह क्या है. मार्क्स के इतने समय बीतने के बाद भी यदि मजदूरों कि बात करने वाले संगठन अपनी हैसियत राजनीति में नहीं बना पाते है तो उनके संगठन के मूल मंत्र में जरुर कोई खामी है. मूल सूत्र के अभाव में कोई रास्ता तय नही हो सकता. वह सूत्र मजदूरों के अपने बीच से आएगा, प्रयोगशाला में बैठकर इसकी चिंता नही कि जा सकती है. जैसे प्यास लगने पे पानी के पास हम खुद ही जाते है, वैसे ही कामगारों को कोई दूसरा मंत्र नही देगा, उन्हें अपने लिए, अपने आपसे उस मंत्र को ढूढना होगा. पर ये भी सही है कि अमेरिका में बैठ कर मजदूरों और गरीबों कि चिंता नही कि जा सकती है, ये चिंता भी उतनी ही भोथरी है, जितना ये सोचना कि विश्व बैंक सच मुच में दुनिया से गरीबी को हटाना चाहता है.आधार वाक्य ही जब सही नही रहेगा तो निष्कर्ष कहा से सही होगा. इस लिए ये कहना लाज़मी है कि हमे प्यास बुझाने के लिए अपना कुआं खोदना ही पड़ेगा. विश्व बैंक कि सोच को उधार लेकर जो तरक्की का रास्ता भारत में बताया जा रहा है और उसे इंद्र से मिला हुआ वरदान माना जा रहा है, उसकी पूरी स्थिति को छिपाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी जा रही है. भारत को अपने पैरों पे खड़ा होने के लिए, गरीबी को हटाने के लिए उसके अपने मर्म को समझना होगा. उधार के सिद्धांतो से कोई देश अमीर नही बनता.
सतीश कुमार सिंह
अटलांटा, अमेरिका