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गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

लोकपाल और राजनीति

हमारा कोई 'स्वाभिमान' है तो भ्रष्ट देश के एक नागरिक के रूप में. हमारे देश के नेता भ्रष्ट है, कर्मचारी भ्रष्ट है,शिक्षा भ्रष्टाचार में डूबी हुई है,पुलिस भ्रष्ट है,इसी के साथ संबंधों में भी यह भ्रष्टाचार घुस गया है. लोकपाल में आरक्षण क्यों होना चाहिए, यह तर्क के परे है.अगर पूरी सरकार ही भ्रष्टचार में लिप्त है तो सरकार के अधीन काम करने वाली जाँच एजेंसी कैसे निष्पक्ष जाँच कर सकेगी? कांग्रेस सरकार हमेशा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले तर्क ही क्यों गढ़ती है. अगर सरकार मजबूत लोकपाल लेकर नहीं आती है तो इसका मतलब है कि वह देश के सभी लोगो को भ्रष्ट करना चाहती है...लेकिन 'देश' क़ा स्वाभिमान सरकारी बिलों से नहीं तय होता, सरकारें और सल्तनतें बदल दी जाती है..

रविवार, 4 दिसंबर 2011


नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..
 
किताबों की तरफ देखता हूँ, 
अपनी नर्म संवेदनाओं की ओर देखता हूँ,
 सबको देखता हूँ, 
स्वार्थ कि अंधी होड़ को देखता हूँ, 
देखता हूँ अपने आप को..
 सोचता हूँ.. 
धूप  हर सुबह नयी चमकीली क्यों लगती है, 
मोर मग्न होकर क्यों नाचता है..
अख़बार हर सुबह नयी खबरों के साथ कैसे आ जाता है...
इसी के साथ
ख़ुशी के पुराने क्षणों को देखता हूँ,
 हंसी के पलों को देखता हूँ, 
पार्टियों को देखता हूँ,
 अपने आकर्षण को देखता हूँ,
 परीक्षा में अच्छे अंक पाने पर होने वाली ख़ुशी को देखता हूँ,
पढ़ाई के दिनों में पैसों कि तंगी को देखता हू,
 अपने पुराने दुखों को देखता हूँ, 
उनसे निकले हुए आसुओं को देखता हूँ,
 उनसे होने वाले बर्ताओं और क्रिया- कलापों को देखता हूँ,
बस में जाते हुए ख़ुशी और गम के पलों को देखता हूँ,
किसी के बारे में सोचते हुए बीत जाने वाले अनुभवों  को देखता हूँ,
 द्वंद्व और उहापोह को देखता हूँ, 
हार और जीत को देखता हूँ, 
असफलताओं से मिले पीड़ा  और आसुओं को देखता हूँ
 रिश्तों को बनते- बिगड़ते हुए देखता हूँ,
 
 महफिलों में गप्प मारने को देखता हूँ, 
ख़ुशी में आत्म -विभोर हो जाने वाले रस को देखता हूँ,
... फिर भी नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..  

रविवार, 17 अप्रैल 2011

CD of Prashant Bhushan and Amar Singh

This is transcription of audio CD between Amar Singh, Prashant Bhushan and Mulayam Singh Yadav
published in (Dainik Bhaskar, bhadas4media.com)


प्रमुख अंश -

ऑपरेटर : आपका कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है..

मुलायम सिंह (एमएस) : हैलो.. हैलो...

अमर सिंह (एएस) : नेताजी आप तो जानते ही हैं ये.. शांतिभूषण जी को (एमएस- हम्म)... बगल में बैठे हुए हैं, (एमएस- हां) प्रशांत भूषण जी इन्हीं के लड़के हैं पीआईएल वगैरा करते हैं, (एमएस-हां) फेमस हैं बहुत, वो भी अच्छे-खासे वकील हैं (एमएस - हम्म) कह रहे थे आगरा वाले मामले के लिए... जस्टिस सिंघवी से उनका बहुत अच्छा है (एमएस- हां) और वो काम करा देंगे (एमएस- बहुत अच्छा किया) ये आप इनसे बात कर लीजिए खुद ही... जो उचित समझें आप कर लीजिए (एमएस- ठीक है)

एमएस : हैलो

शांति भूषण (एसबी) : देखिए प्रशांत पीआईएल करते हैं.. (एमएस- हम्म) उससे कुछ कमाते नहीं (एमएस-हां) देखिए हमने सब स्टोरी सुन ली (एमएस-हम्म) एक ही तरीका है, प्रशांत बहुत अच्छा मैनेज करते हैं (एमएस-ठीक है) इसके लिए बहुत ज्यादा पैसे की जरूरत नहीं है, चार करोड़ रुपया बहुत है (बैकग्राउंड आवाज अस्पष्ट)

देखिए ये तो मजबूरी है।

भारद्वाज, वो खुद ही करप्ट है (एमएस- ठीक है) चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया तो ये तो जज बनाने के लिए कहते हैं कि अच्छा इत्ते लाख रुपए ले आओ, मैं तुम्हें जज बनवा दू (वाइस कट)

एमएस : अब इनको कौन समझाए, चाहे गृह मंत्री हो चाहे कोई हो ऐरा-गैरा, इनको क्या समझाया जाए

एसबी : रिश्वत.. रु.. रुपया लेते हैं। जज बनाने के लिए तो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया वगैरा सारे जैसे करप्ट हैं तो इन सब जजेस को तो रुपए दिए (एमएस : चलिए ठीक है) लेकिन जो हम कह रहे थे कि आप प्रशांत का इंतजाम कर दीजिए (बैकग्राउंड की बातचीत अस्पष्ट) (फोन फिर से बजता है)..

एमएस : वो हम कर लेंगे (फोन फिर बजता है, दूसरी बातचीत शुरू होती है)..

एमएस : हैलो।

एएस : ठीक हो गया सर।

एमएस : हां, ठीक हो गया बहुत अच्छा।

एएस : नहीं तो ये तो मर जाएंगे ये सब।

एमएस : हां कहीं के नहीं रहेंगे... कल प्रकाश करात देंगे?

एएस : हां देंगे.. चलिए सर...

एमएस : हां चलिए..

एएस : आपका आशीर्वाद बना रहे हम लोगों के साथ।

एमएस : बस पूरा आशीर्वाद है...

एएस : जी-जी..

एमएस : अमिताभ गए?

एएस : हां, वो गए..

एमएस : अच्छा।

एएस : ओके।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

मत उलझाओ

जिस तरह अन्ना छाए हुए है, इस बात को बहुत से लोग पचा नही पा रहे है. उन्हे उनका अतीत एकाएक दिखाई देने लगा है. वे लोग एकाएक मीडिया पर भी अपना गुस्सा उतारने लगे है. कभी इसमे जुडे लोगो को आरक्षण विरोधी तो कभी उन्हे महाराष्ट्र के आन्दोलन मे राज ठाकरे के साथ जोड़कर देख रहे है. क्या आरक्षण विरोधी भ्रष्टाचार का विरोधी नही हो सकता है? आरक्षण का मुद्दा और भ्रष्टाचार का मुद्दा दो समय का अलग अलग मुद्दा है. इसे एक साथ जोड़कर देखना भ्रान्ति ही नही, बल्कि एक तरह का निराशावाद है.अन्ना ने नरेन्द्र मोदी और नितीश कुमार के शासन की तारीफ क्या कर दी, क्यू इसे सम्प्रदयावाद से जोड़कर देखा जाने लगा है. अन्ना वास्तव मे कुछ लोगो के लिए सिर दर्द बन गए है, जो अपनी राजनीति के आगे सबको बौना मानते है, साथ मे इस मुगालते मे भी रह्ते है कि, क्यू अचानक कोई इतना आगे बढ़ गया. महाराष्ट्र के एक छोटे से गाव का आदमी कैसे जन्तर- मन्तर पर आकर राष्ट्रीय मीडिया का फोकस बन जाता है. यह उपलब्धि बहुत से लोगो को रास नही आ रही है. इस आन्दोलन को वे आरक्षण विरोधियो का आन्दोलन मानकर इसके पूरे चरित्र पर सवाल उठा रहे है. बाबा रामदेव ने तो इसके समिति के उपर वंशवाद का आरोप लगाया है. कुछ लोगो की आदत हो गई है कि जो भी अच्छा हो उसका विरोध इसलिए करो की उन्हे हर जगह कुछ न कुछ सस्पेन्स दिखाई देता है. कोई भी मैथ का आदर्श नही होता.गान्धी भी नही थे. ऐसा कोई नही है, जिसके ऊपर आरोप नही लगे हो.गान्धी और सुभाष चन्द्र बोस पर भी आरोप लगे. आरक्षण के सन्दर्भ मे वी पी सिंह पर भी देवीलाल के साथ राजनीति करने का आरोप लगा. कृष्ण मेनन को भी १९६२ कि लडाई मे रक्षा मन्त्री के पद से हटना पड़ा,जबकी उनकी कोई गलती नही थी. मीडिया का अपना सच है. मीडिया, कार्पोरेट घरानो से जुड़ा है, इसलिए उनके विरोध मे कुछ भी नही कर सकता है. यही बात है तो टाटा और अम्बानी के बारे मे मीडिया ने क्यू छापा. सबकी नीयत पर सवाल उठाना हमेशा सही नही होता है.हमे सबको जानना चाहिए.लेकिन जो बाते ठीक है, उन्हे उलझाना नही चाहिए.
सतीश कुमार सिंह
वाराणसी .