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रविवार, 10 अप्रैल 2011

मत उलझाओ

जिस तरह अन्ना छाए हुए है, इस बात को बहुत से लोग पचा नही पा रहे है. उन्हे उनका अतीत एकाएक दिखाई देने लगा है. वे लोग एकाएक मीडिया पर भी अपना गुस्सा उतारने लगे है. कभी इसमे जुडे लोगो को आरक्षण विरोधी तो कभी उन्हे महाराष्ट्र के आन्दोलन मे राज ठाकरे के साथ जोड़कर देख रहे है. क्या आरक्षण विरोधी भ्रष्टाचार का विरोधी नही हो सकता है? आरक्षण का मुद्दा और भ्रष्टाचार का मुद्दा दो समय का अलग अलग मुद्दा है. इसे एक साथ जोड़कर देखना भ्रान्ति ही नही, बल्कि एक तरह का निराशावाद है.अन्ना ने नरेन्द्र मोदी और नितीश कुमार के शासन की तारीफ क्या कर दी, क्यू इसे सम्प्रदयावाद से जोड़कर देखा जाने लगा है. अन्ना वास्तव मे कुछ लोगो के लिए सिर दर्द बन गए है, जो अपनी राजनीति के आगे सबको बौना मानते है, साथ मे इस मुगालते मे भी रह्ते है कि, क्यू अचानक कोई इतना आगे बढ़ गया. महाराष्ट्र के एक छोटे से गाव का आदमी कैसे जन्तर- मन्तर पर आकर राष्ट्रीय मीडिया का फोकस बन जाता है. यह उपलब्धि बहुत से लोगो को रास नही आ रही है. इस आन्दोलन को वे आरक्षण विरोधियो का आन्दोलन मानकर इसके पूरे चरित्र पर सवाल उठा रहे है. बाबा रामदेव ने तो इसके समिति के उपर वंशवाद का आरोप लगाया है. कुछ लोगो की आदत हो गई है कि जो भी अच्छा हो उसका विरोध इसलिए करो की उन्हे हर जगह कुछ न कुछ सस्पेन्स दिखाई देता है. कोई भी मैथ का आदर्श नही होता.गान्धी भी नही थे. ऐसा कोई नही है, जिसके ऊपर आरोप नही लगे हो.गान्धी और सुभाष चन्द्र बोस पर भी आरोप लगे. आरक्षण के सन्दर्भ मे वी पी सिंह पर भी देवीलाल के साथ राजनीति करने का आरोप लगा. कृष्ण मेनन को भी १९६२ कि लडाई मे रक्षा मन्त्री के पद से हटना पड़ा,जबकी उनकी कोई गलती नही थी. मीडिया का अपना सच है. मीडिया, कार्पोरेट घरानो से जुड़ा है, इसलिए उनके विरोध मे कुछ भी नही कर सकता है. यही बात है तो टाटा और अम्बानी के बारे मे मीडिया ने क्यू छापा. सबकी नीयत पर सवाल उठाना हमेशा सही नही होता है.हमे सबको जानना चाहिए.लेकिन जो बाते ठीक है, उन्हे उलझाना नही चाहिए.
सतीश कुमार सिंह
वाराणसी .

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