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मंगलवार, 26 जुलाई 2016

बिना तर्क के ..

बिना तर्क के ..

बिना तर्क के 
   सच को जानने का जज्बा जब एक बार पङ जाता है तो सब चीजे बेमानी लगाने लगती है. धुंधले और मटमैले फलक छट जाते हैं. ऐसा होता है एक बार जब आप इससे परेशांन हो जाते है क्योंकि यह रास्ता इतना आसान भी नहीं है. पर जब आप इस रास्ते पर एक बार चल पड़ते है तो गलती करने का कोई चांस नहीं बचता  है. तब खुश होने का रास्ता आपके पास होता है, उस रास्ते से दूर जाने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है.तब  सब ग़लतफ़हमियों से अलग होकर नयी रोशनी के प्रकाश से अलंकृत होना होता है. छोटे छोटे प्रश्न अपने आप से करो , अपने आप सब उत्तर मिल जाएगा. 
       यह बात नहीं है कि कुछ सोचा जाए या समझा  जाए. हकीकत  में  वह सब नहीं होता और वह होना भी नहीं चाहिए। कही से आप शुरू करो बात वही पर आकर रुकती है. किसी को कोई नहीं बता सकता है कि  कैसे सोचा जाए।  वे, बुद्धिमता, आपको ख़ारिज करके अपने रास्ते  चले जाएंगे ,आपको उसकी भनक भी नहीं लगने देगे.  जीवन में सब कुछ तो नार्मल ही होता है. कौन कहा किसी से फरियाद करने जाता है. किसी को किसी के आलेख को पढ़ने की फुरसत कहा है. सब यहाँ  एक से बढ़कर एक है. कहानी कहो या कविता कोई दूसरे के यथार्थ के बारे में थोड़ा भी जहमत उठाना नहीं चाहता. 
              बुनियादी सवाल हो या फिजूल की कोई बात सब जगह ओखम रेजर की जरुरत होती है. वह कैसे, यह सब अपने से तय करना पड़ता है. बौद्धिकता का अपना एक दायरा  होता है।  उसका भी  अपना एक इंटरेस्ट होता है।  गणित के  फारमूले की तरह सब कुछ स्पष्ट नहीं होता है।  समाज  बिना तर्क के चलता है,  वह तो बस चलता ही रहता है।  मत पूछना यह सब कैसे होता है. बस समझ जाना तो, दूसरे को समझाने की कोशिश करना.  वहा न भाव है न श्रद्धा बस ऐसे ही. ठीक तो है. किसी से कुछ न पूछो, न ही किसी से समझने की उम्मीद करो. न तो किसी को समझ में आएगा, न ही कोई जानता है. सब एक्टिंग करते है. 
विश्वास होता है सच को जानने के बाद, लेकिन जब सच जान जाते है तो विश्वास  का नया अवतार जन्म लेता है.. जानने के बाद तास के पत्तो की  तरह क़िरदार ढह जाते है. 
            
        यही से अपने आप पर भरोसा करना  आएगा.  और जब अपने आप पर एक बार भरोसा करना आ गया तो गलतफहमी  की कोई गुंजाइश नहीं बचती है. यहाँ तर्क भी नहीं है, इतना ही नहीं यहाँ कोई समर्पण भी नहीं है. रोज नए रस्ते और रोज नई  चुनौतियां, सच में कितना मजेदार है न..  रोचक सफर, रोज नए मुकाम, रोज नई  दुनिया.. यह है तर्क का अनोखा, नया पहलू  जो स्वयं अपने आप को वहा पर नहीं लाता, मुकाम पर पहुचाने के बाद उसकी कहानी ख़त्म हो जाती है.  

सोमवार, 20 अगस्त 2012

जनता को सारे सवालो को पूछना पड़ेगा

सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बनने के लिए जी तोड़ मेहनत करने की सलाह अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओ को दे रहे है. एक बात समझने की है कि मुलायम सिंह अगर देश के प्रधानमंत्री बन जाते है तो उससे देश क़ा क्या भला होगा ? अपने पिछले शासन-काल में जब ये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री  थे तो पुलिस भर्ती क़ा जबरदस्त घोटाला सामने आया था. 

यूपी के विकास कि तस्वीर तो इन्होने बदली नहीं, लेकिन एक बात निश्चित कर दी कि इनके परिवार के सभी लोग सांसद, मंत्री और विधायक तो बन ही जाए. अभी प्रदेश में इनकी ही सरकार है, विकास क़ा कोई माडल  तो दिखा नहीं, उलटे सड़कों कि स्थिति और ख़राब हो गयी और बिजली कब आएगी पता नहीं. दफ्तरों के छोटे मोटे भ्रष्टाचार, शिक्षा कि स्थिति, शासन व्यवस्था रोजगार,  सब वैसे के वैसे ही है. ,  जब इनकी पार्टी और सरकार प्रदेश की स्थिति को बढ़ियाँ नहीं कर सकती  है, तो देश क़ा क्या होगा.., भगवान् ही मालिक है... 

अच्छा तो यह होता कि यूपी को  विकास कि राह पर ले जाते और इस विकास के वास्ते आप देश कि बागडोर सँभालने क़ा स्वप्न देखते.. जिस तरह से राष्ट्रपति चुनाव में सपा ने कांग्रेस क़ा साथ दिया, वह सबको मालूम है. यूपी को केंद्र से करीब ५० हजार करोड़ क़ा अतिरिक्त धन आवंटित किया जायेगा..वास्तव में ये सब अगर विकास में ख्रर्च हो तो इससे प्रदेश कि कुछ तस्वीर तो बदलेगी, पर ऐसा होना नामुमकिन दीखता है.

पुरे प्रदेश में आप घूम कर आ जाइये, कोई यह कहते हुए नहीं मिलेगा कि ये सरकार यूपी को तरक्की के राह पर ले जाएगी.किसी को यह कहना एक स्वप्न कि तरह लगता है.लोगो क़ा ऐसा सोचना जायज भी है. अभी तक किसी राजनितिक पार्टी ने जनता के विश्वाश को बढ़ाया  नहीं है, बल्कि उलटे उसके विश्वाश पर कुठाराघात ही किया है. आम लोग कहते है कि ये सब अपनी तिजोरी भरने में लगे हुए है. जनता कि सुध किसे है. लेकिन अब यह कहने से काम नहीं चलेगा. जनता को सारे सवालो को पूछना पड़ेगा, इसका उत्तर भी उन्हें मिलना चाहिए.
सतीश कुमार सिंह
वाराणसी 

शनिवार, 12 मई 2012

अम्बेडकर के इस कार्टून में ऐसा क्या है, जिसपर बवाल मचा हुआ है.संविधान के लागू होने के पहले क़ा यह कार्टून मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर क़ा है. उस समय के तत्कालीन नेताओ को इस कार्टून पर आपत्ति नहीं थी.अम्बेडकर भी उस समय थे. संविधान बनने में हो रही देरी के बारे में सब भारतीय जानना चाहते थे.देश को स्वतंत्र हुए कुछ ही दिन हुए थे.संविधान बनाने में कई आपत्तियां थी.इसलिए देरी हो रही थी.घोंघा पर बैठे अम्बेडकर आखिर क्या कर सकते थे.घोंघा की चाल सब जानते है.नेहरु गुस्से में घोंघा को मारकर उसकी गति बढ़ाना चाहते है..मायावती को इतने दिन बाद इस कार्टून की सुध क्यों आई? जब वह कही नहीं है, तो इस कार्टून के माध्यम से अपने को लोगो के बीच बनाये रखना चाहती है.वैसे भी मायावती कितना भी कर ले, घोटालों से उनका पीछा छूटने वाला नहीं है. यहाँ पर यही बात समझ में आती है कि, अम्बेडकर और मायावती के सरोकारों में बहुत अंतर है...

मंगलवार, 8 मई 2012

विमर्श क़ा सही पाठ

 हिंदी साहित्य -लेखन ने अपने फलक बहुत दूर तक फैला लिए है, लेकिन अभी भी कुछ चीज़े बाकी है, जिसकी वजह से यह पाठक कि अंतरात्मा को पकड़ने में कुछ हद तक दूर है. इसके पाठको की बेचैनी क़ा ख़त्म होना, वह सबूत है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि सच मायने में साहित्य, समाज की नब्ज पहचानने में कही गलती कर रहा है. हालाँकि साहित्य और समाज में हर युग में एक एक संवाद रहा है तो उसमे दूरी भी रही है.यही वह जगह है जहा साहित्य के पास अपना आकाश होता है. बिम्ब प्रस्तुत करना, अलंकारों में बांध लेना, तुकबंदी और लय बनाना पहले से साहित्य में चला आ रहा है.  लेकिन, विमर्श की दुनिया में अब जरुरी हो गया है कि लिखने वाले क़ा सरोकार कैसा है.जैसे सी ग्रेड की फिल्मों में कोई नामी अदाकारा काम नहीं करती वैसे ही, घटिया सरोकारों वाले लोग अच्छा साहित्य लिख ही नहीं सकते है. लेखक  और कवि  के सरोकार उसकी ज़िन्दगी क़ा हिस्सा होते है. साहित्य में प्रगतिशीलता और नव- रचनात्मकता की बात करना, और रात होते  ही प्रगतिशीलता को खूंटी पर टांग देने वाले लेखको कि बड़ी ज़मात को ज़माना जानता है. निजी ज़िन्दगी क़ा एक- एक पल उस बड़े सरोकार क़ा हिस्सा होता है, जिसको लेकर विमर्श के मुद्दे उठाये जाते है. जब तक विमर्श को जिया नहीं जाता तब तक उस पर प्रकाश डालने कि सही मायने योग्यता नहीं होती.लेकिन संचार माध्यमों कि पहुँच ने सरोकारों से सही मायने में समबन्ध नहीं रखने वाले ऐसे परजीवी लेखको और चिंतकों कि फौज खड़ी कर दी है जिससे अब पहचानना मुश्किल हो गया है कि इसमे सही कौन है. पाठको और चिंतकों कि कुशलता की कमी ने वह शून्य पैदा कर दिया है, जिससे बहुत कुछ नया निकल कर आने की उम्मीद कम बची है. भारतीय भाषा के कुछ नामी लेखको और चिंतकों ने बहुत से विदेशी चिंतको कि शैली, संरचना और भाव को आत्मसात  किया है...लेकिन अब समय आ गया है कि अपनी ज़मीं पर हम अपने विमर्शो के सहारे आगे बढ़े. संवाद तो रहना चाहिए, लेकिन दिखावटी टूटपुजियाँपन ख़त्म होना चाहिए.   कविता में कहने की आदत नहीं. अब समय है किताबों कि दुनियां से बाहर आकर अपनी सोच को आकार देने क़ा.नदी, पहाड़ और अपनी गहरी संवेदनाओ की कविताये लिखना और वाह- वाही पाना, अब बीते ज़माने की बातें लगती है. यह भी सच है कि किसी की कविता किसी के मर्म को कितना झकझोर पाती है, यह तो पाठक ही तय करता है. लेकिन पाठक कैसा है, उसने अपने को कैसा बनाया है, यह बात उस पाठक  के अलावा बेहतर तरीके से कौन जानता है. अगर पाठक  ही अपने किसी मर्म में ईमानदार और संवेदनशील नहीं है,तो विमर्श किसका और किसके लिए? सच तो यही है कि पाठक और लेखक दोनों को किसी न किसी  स्तर पर ईमानदार होना ही पड़ेगा..यह आवश्यक अनिवार्यता ही विमर्श को सही धरातल पर ले जाने की विवशता है. 
सतीश कुमार सिंह 

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

लोकपाल और राजनीति

हमारा कोई 'स्वाभिमान' है तो भ्रष्ट देश के एक नागरिक के रूप में. हमारे देश के नेता भ्रष्ट है, कर्मचारी भ्रष्ट है,शिक्षा भ्रष्टाचार में डूबी हुई है,पुलिस भ्रष्ट है,इसी के साथ संबंधों में भी यह भ्रष्टाचार घुस गया है. लोकपाल में आरक्षण क्यों होना चाहिए, यह तर्क के परे है.अगर पूरी सरकार ही भ्रष्टचार में लिप्त है तो सरकार के अधीन काम करने वाली जाँच एजेंसी कैसे निष्पक्ष जाँच कर सकेगी? कांग्रेस सरकार हमेशा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले तर्क ही क्यों गढ़ती है. अगर सरकार मजबूत लोकपाल लेकर नहीं आती है तो इसका मतलब है कि वह देश के सभी लोगो को भ्रष्ट करना चाहती है...लेकिन 'देश' क़ा स्वाभिमान सरकारी बिलों से नहीं तय होता, सरकारें और सल्तनतें बदल दी जाती है..

रविवार, 4 दिसंबर 2011


नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..
 
किताबों की तरफ देखता हूँ, 
अपनी नर्म संवेदनाओं की ओर देखता हूँ,
 सबको देखता हूँ, 
स्वार्थ कि अंधी होड़ को देखता हूँ, 
देखता हूँ अपने आप को..
 सोचता हूँ.. 
धूप  हर सुबह नयी चमकीली क्यों लगती है, 
मोर मग्न होकर क्यों नाचता है..
अख़बार हर सुबह नयी खबरों के साथ कैसे आ जाता है...
इसी के साथ
ख़ुशी के पुराने क्षणों को देखता हूँ,
 हंसी के पलों को देखता हूँ, 
पार्टियों को देखता हूँ,
 अपने आकर्षण को देखता हूँ,
 परीक्षा में अच्छे अंक पाने पर होने वाली ख़ुशी को देखता हूँ,
पढ़ाई के दिनों में पैसों कि तंगी को देखता हू,
 अपने पुराने दुखों को देखता हूँ, 
उनसे निकले हुए आसुओं को देखता हूँ,
 उनसे होने वाले बर्ताओं और क्रिया- कलापों को देखता हूँ,
बस में जाते हुए ख़ुशी और गम के पलों को देखता हूँ,
किसी के बारे में सोचते हुए बीत जाने वाले अनुभवों  को देखता हूँ,
 द्वंद्व और उहापोह को देखता हूँ, 
हार और जीत को देखता हूँ, 
असफलताओं से मिले पीड़ा  और आसुओं को देखता हूँ
 रिश्तों को बनते- बिगड़ते हुए देखता हूँ,
 
 महफिलों में गप्प मारने को देखता हूँ, 
ख़ुशी में आत्म -विभोर हो जाने वाले रस को देखता हूँ,
... फिर भी नहीं जान पाता जीवन क़ा फलसफा..  

रविवार, 17 अप्रैल 2011

CD of Prashant Bhushan and Amar Singh

This is transcription of audio CD between Amar Singh, Prashant Bhushan and Mulayam Singh Yadav
published in (Dainik Bhaskar, bhadas4media.com)


प्रमुख अंश -

ऑपरेटर : आपका कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है..

मुलायम सिंह (एमएस) : हैलो.. हैलो...

अमर सिंह (एएस) : नेताजी आप तो जानते ही हैं ये.. शांतिभूषण जी को (एमएस- हम्म)... बगल में बैठे हुए हैं, (एमएस- हां) प्रशांत भूषण जी इन्हीं के लड़के हैं पीआईएल वगैरा करते हैं, (एमएस-हां) फेमस हैं बहुत, वो भी अच्छे-खासे वकील हैं (एमएस - हम्म) कह रहे थे आगरा वाले मामले के लिए... जस्टिस सिंघवी से उनका बहुत अच्छा है (एमएस- हां) और वो काम करा देंगे (एमएस- बहुत अच्छा किया) ये आप इनसे बात कर लीजिए खुद ही... जो उचित समझें आप कर लीजिए (एमएस- ठीक है)

एमएस : हैलो

शांति भूषण (एसबी) : देखिए प्रशांत पीआईएल करते हैं.. (एमएस- हम्म) उससे कुछ कमाते नहीं (एमएस-हां) देखिए हमने सब स्टोरी सुन ली (एमएस-हम्म) एक ही तरीका है, प्रशांत बहुत अच्छा मैनेज करते हैं (एमएस-ठीक है) इसके लिए बहुत ज्यादा पैसे की जरूरत नहीं है, चार करोड़ रुपया बहुत है (बैकग्राउंड आवाज अस्पष्ट)

देखिए ये तो मजबूरी है।

भारद्वाज, वो खुद ही करप्ट है (एमएस- ठीक है) चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया तो ये तो जज बनाने के लिए कहते हैं कि अच्छा इत्ते लाख रुपए ले आओ, मैं तुम्हें जज बनवा दू (वाइस कट)

एमएस : अब इनको कौन समझाए, चाहे गृह मंत्री हो चाहे कोई हो ऐरा-गैरा, इनको क्या समझाया जाए

एसबी : रिश्वत.. रु.. रुपया लेते हैं। जज बनाने के लिए तो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया वगैरा सारे जैसे करप्ट हैं तो इन सब जजेस को तो रुपए दिए (एमएस : चलिए ठीक है) लेकिन जो हम कह रहे थे कि आप प्रशांत का इंतजाम कर दीजिए (बैकग्राउंड की बातचीत अस्पष्ट) (फोन फिर से बजता है)..

एमएस : वो हम कर लेंगे (फोन फिर बजता है, दूसरी बातचीत शुरू होती है)..

एमएस : हैलो।

एएस : ठीक हो गया सर।

एमएस : हां, ठीक हो गया बहुत अच्छा।

एएस : नहीं तो ये तो मर जाएंगे ये सब।

एमएस : हां कहीं के नहीं रहेंगे... कल प्रकाश करात देंगे?

एएस : हां देंगे.. चलिए सर...

एमएस : हां चलिए..

एएस : आपका आशीर्वाद बना रहे हम लोगों के साथ।

एमएस : बस पूरा आशीर्वाद है...

एएस : जी-जी..

एमएस : अमिताभ गए?

एएस : हां, वो गए..

एमएस : अच्छा।

एएस : ओके।