अम्बेडकर के इस कार्टून में ऐसा क्या है, जिसपर बवाल मचा हुआ है.संविधान के लागू होने के पहले क़ा यह कार्टून मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर क़ा है. उस समय के तत्कालीन नेताओ को इस कार्टून पर आपत्ति नहीं थी.अम्बेडकर भी उस समय थे. संविधान बनने में हो रही देरी के बारे में सब भारतीय जानना चाहते थे.देश को स्वतंत्र हुए कुछ ही दिन हुए थे.संविधान बनाने में कई आपत्तियां थी.इसलिए देरी हो रही थी.घोंघा पर बैठे अम्बेडकर आखिर क्या कर सकते थे.घोंघा की चाल सब जानते है.नेहरु गुस्से में घोंघा को मारकर उसकी गति बढ़ाना चाहते है..मायावती को इतने दिन बाद इस कार्टून की सुध क्यों आई? जब वह कही नहीं है, तो इस कार्टून के माध्यम से अपने को लोगो के बीच बनाये रखना चाहती है.वैसे भी मायावती कितना भी कर ले, घोटालों से उनका पीछा छूटने वाला नहीं है. यहाँ पर यही बात समझ में आती है कि, अम्बेडकर और मायावती के सरोकारों में बहुत अंतर है...
शनिवार, 12 मई 2012
मंगलवार, 8 मई 2012
विमर्श क़ा सही पाठ
हिंदी साहित्य -लेखन ने अपने फलक बहुत दूर तक फैला लिए है, लेकिन अभी भी कुछ चीज़े बाकी है, जिसकी वजह से यह पाठक कि अंतरात्मा को पकड़ने में कुछ हद तक दूर है. इसके पाठको की बेचैनी क़ा ख़त्म होना, वह सबूत है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि सच मायने में साहित्य, समाज की नब्ज पहचानने में कही गलती कर रहा है. हालाँकि साहित्य और समाज में हर युग में एक एक संवाद रहा है तो उसमे दूरी भी रही है.यही वह जगह है जहा साहित्य के पास अपना आकाश होता है. बिम्ब प्रस्तुत करना, अलंकारों में बांध लेना, तुकबंदी और लय बनाना पहले से साहित्य में चला आ रहा है. लेकिन, विमर्श की दुनिया में अब जरुरी हो गया है कि लिखने वाले क़ा सरोकार कैसा है.जैसे सी ग्रेड की फिल्मों में कोई नामी अदाकारा काम नहीं करती वैसे ही, घटिया सरोकारों वाले लोग अच्छा साहित्य लिख ही नहीं सकते है. लेखक और कवि के सरोकार उसकी ज़िन्दगी क़ा हिस्सा होते है. साहित्य में प्रगतिशीलता और नव- रचनात्मकता की बात करना, और रात होते ही प्रगतिशीलता को खूंटी पर टांग देने वाले लेखको कि बड़ी ज़मात को ज़माना जानता है. निजी ज़िन्दगी क़ा एक- एक पल उस बड़े सरोकार क़ा हिस्सा होता है, जिसको लेकर विमर्श के मुद्दे उठाये जाते है. जब तक विमर्श को जिया नहीं जाता तब तक उस पर प्रकाश डालने कि सही मायने योग्यता नहीं होती.लेकिन संचार माध्यमों कि पहुँच ने सरोकारों से सही मायने में समबन्ध नहीं रखने वाले ऐसे परजीवी लेखको और चिंतकों कि फौज खड़ी कर दी है जिससे अब पहचानना मुश्किल हो गया है कि इसमे सही कौन है. पाठको और चिंतकों कि कुशलता की कमी ने वह शून्य पैदा कर दिया है, जिससे बहुत कुछ नया निकल कर आने की उम्मीद कम बची है. भारतीय भाषा के कुछ नामी लेखको और चिंतकों ने बहुत से विदेशी चिंतको कि शैली, संरचना और भाव को आत्मसात किया है...लेकिन अब समय आ गया है कि अपनी ज़मीं पर हम अपने विमर्शो के सहारे आगे बढ़े. संवाद तो रहना चाहिए, लेकिन दिखावटी टूटपुजियाँपन ख़त्म होना चाहिए. कविता में कहने की आदत नहीं. अब समय है किताबों कि दुनियां से बाहर आकर अपनी सोच को आकार देने क़ा.नदी, पहाड़ और अपनी गहरी संवेदनाओ की कविताये लिखना और वाह- वाही पाना, अब बीते ज़माने की बातें लगती है. यह भी सच है कि किसी की कविता किसी के मर्म को कितना झकझोर पाती है, यह तो पाठक ही तय करता है. लेकिन पाठक कैसा है, उसने अपने को कैसा बनाया है, यह बात उस पाठक के अलावा बेहतर तरीके से कौन जानता है. अगर पाठक ही अपने किसी मर्म में ईमानदार और संवेदनशील नहीं है,तो विमर्श किसका और किसके लिए? सच तो यही है कि पाठक और लेखक दोनों को किसी न किसी स्तर पर ईमानदार होना ही पड़ेगा..यह आवश्यक अनिवार्यता ही विमर्श को सही धरातल पर ले जाने की विवशता है.
सतीश कुमार सिंह
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